वो सुबह सुबह की मदमस्त आवाज़ उनकी,
जैसे गिर रही हों बूँदें बारिश की...
वो चेहरे पे आते उलझे हुए गेसुओं की घटा,
बादलों ने हो जैसे सूरज से न निकलने की सिफारिश की...
उन्हें सोता देख तो फिर भी रह पा रहे थे हम,
अब कैसे हो काबू कोइ हमें ये बताये...
जब बिस्तर से उतर के अंगड़ाई लें वो इस तरह,
जैसे खुदा ने फुर्सत से हो ये साज़िश की...
Saturday, February 6, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)