वो सुबह सुबह की मदमस्त आवाज़ उनकी,
जैसे गिर रही हों बूँदें बारिश की...
वो चेहरे पे आते उलझे हुए गेसुओं की घटा,
बादलों ने हो जैसे सूरज से न निकलने की सिफारिश की...
उन्हें सोता देख तो फिर भी रह पा रहे थे हम,
अब कैसे हो काबू कोइ हमें ये बताये...
जब बिस्तर से उतर के अंगड़ाई लें वो इस तरह,
जैसे खुदा ने फुर्सत से हो ये साज़िश की...
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2 comments:
You have proved your dexterity in our maatra-bhaasha too. Ending's worth an encore !!
awesome awesome poem "badaalon ne jaise suraj se...." kya line hai. bahut khoob!
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